Friday, October 22, 2010

भाषा-मिश्रण से भाषा-प्रदूषण

जब दो संस्कृतियों का मिलन होता है तो भाषा-मिश्रण स्वाभाविक है। बोलचाल में तो यह मिश्रण बहुत देर से चला आ रहा है। लिखित में भी दूसरी भाषाओं के कुछ कुछ शब्द आवश्यकतानुसार आते रहे हैं परंतु अब जिस प्रकार का मिश्रण समाचार-पत्रों के माध्यम से सामने आ रहा है वह किसी षढ़यंत्र का हिस्सा लगता है।
 
किसी भी देश में द्विभाषिकता एक अच्छी बात है परंतु अपनी भाषा या भाषाओं को नीचे गिरा कर अंग्रेज़ी को प्राथमिकता देना हमारी दीर्घकालीन दासता के अवशेष हैं जिनसे हम भारतीय मुक्त नहीं हो पा रहे बल्कि उसमें और फंसते जा रहे हैं।  यह भाषा-मिश्रण सामन्य स्थिति को लांघ कर भाषा-प्रदूषण की स्थिति तक आ पहुंचा है। इस प्रकार का मिश्रण अपनी भाषा को ही चुनौती देने वाली बात है कि तुम इतनी शक्तिहीन हो कि तुम अंग्रेज़ी की वैसाखी के बिना चल ही नहीं सकतीं। यह देश का अपमान है, हमारे संविधान की अवमानना है और खुले आम हमारी सब भारतीय भाषाओं को चुनौती है, हमारी अभिव्यक्ति और हमारी अस्मिता का आह्वान है ।
 
इस भाषा-मिश्रण का एक दूसरा पक्ष यह है कि इस प्रकार का मिश्रण हमारा सामान्य रोज़मर्रा का व्यवहार इस सीमा तक बन गया है कि हम उस खिचड़ी भाषा के बिना अपनी कोई बात  कह ही नहीं सकते -  न हिन्दी में और न ही अंग्रेज़ी में। इस कारण अपने व्यक्तित्व में दोनों भाषाओं के विकास का अवसर हम खो देते हैं।  भाषा का संपोषण तो उसके प्रयोग से ही होता है। जब हिन्दी के नए नए शब्दों को प्रयोग में लाने के लिए याद करने का और उन्हें आत्मसात् करने का अवसर होता है वहां तब हम अंग्रेज़ी शब्दों को वहां अनायस ले आते हैं और जहां अंग्रेज़ी का शब्द समझ में नहीं आता वहां अपनी भारतीय भाषा में बोलना शुरू कर देते हैं। इससे दोनों ही भाषाओं में हमारा व्यक्तिगत भाषा-विकार अवरुद्ध होता है।  ऐसा करने के कारण हम ऐसी आशा कैसे कर सकते हैं कि कि चाहने पर भी ठीक अवसर पर बोलने में या लिखने में हमें वे शब्द अनायस स्मरण हो आएं और उन भाषाओं की शब्द-शक्ति हमारी भाषिक प्रवीणत का हिस्सा बन जाए । इस तरह धीरे धीरे शब्द हमारी चेतना से अवचेतना में चले जाते हैं। यह भाषा-ह्रास की प्रक्रिया की शुरुआत है और धीरे धीरे जनमानस में भाषा कमज़ोर हो जाती है। जितनी मात्रा में हम हिन्दी में अग्रेज़ी लाएंगे उनी मात्रा में हिन्दी का ह्रास अवश्यंभावी है। आज भारत कि सामान्य स्थिति यह है कि अधिकांश भारतीय न तो अंग्रेज़ी में प्रवीणता हासिल कर सके हैं और न ही अपनी भारतीय भाषा में। दोनों को मिला कर अंधपंगुन्याय से काम ज़रूर चल जाता है। खिचड़ी भाषा एक अभिशाप है जो हमें ले डूबेगा। हम अपनी बात न अंग्रेज़ी में ठीक से कह पाते हैं और न ही अपनी भाषा में। यह कौनसे विकसित देश की कहानी है? हम आज न घर के रहे न घाट के रहे। यह कैसी विडंबना है!
 
जिस स्तर का भाषा-मिश्रण हिन्दी के समाचार-पत्रों में दिखाई दे रहा है अगर उसको न रोका गया तो उसे रोकने के लिए कुछ करना पड़ेगा। अगर ये भूत बातों से नहीं मानेंगे तो लातें विभिन्न रूपों में आकर इनको लताड़ेंगी। इन्दौर की हिन्दी समाचार-पत्रों की होलिका उसका उपक्रम है।
 लेखक:डा- सुरेन्द्र 
गंभीर

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