मैं पूरी तरह से सहमत हूं कि हिंदी केवल कवियों और विचारकों की भाषा बनकर रह गई है। इसी वजह से आज यह नौबत आई है कि आज हम हिंदी दिवस मना रहे हैं। 365 दिनों में से एक दिन हम हिंदी के बारे में बात करते हैं। फिर लोग कहते हैं कि हिंदी हमारी मातृभाषा है। मेरा कहना है कि हिंदी की इस दशा के जिम्मेदार हिंदी के ठेकेदार ही हैं। उन्होंने हिंदी को इतना मुश्किल बना दिया है कि वो हिंदी आम बोलचाल की भाषा हो ही नहीं सकती। हिंदी को आम बोलचाल की भाषा होना जरूरी है। इसे और ज्यादा आसान करना बहुत जरूरी है। हिंदी कवियों और सरकार ने हिंदी भाषा को कल्ष्टि भाषा बना दिया है। यह केवल ज्ञानी और विद्वानों की भाषा बनकर रह गई है। लेकिन इसे आज की पीढ़ी की भाषा बनाने के लिए इसे कुछ ज्यादा आसान बनाने की जरूरत है। हिंदी को वक्त के साथ बदलने की जरूरत है। हिंदी भाषा को बदलना ही होगा। मीडिया के द्वारा जो हिंदी भाषा के शब्दों का प्रयोग करके हिंदी को और ज्यादा आसान बनाया जा रहा है। ऐसे शब्दों का प्रयोग करके मीडिया हिंदी का सरलिकरण कर रही है। मैं इन शब्दों के प्रयोग से पूरे तरीक से सहमत हूं। लोग जिस तरह हिंदी को स्वीकार करें उसी तरह से पेश करना चाहिए। लोग जिस तरह से सुनना बोलना चाहे उसी तरह से हिंदी को पेश किया जाना चाहिए, इससे हिंदी का प्रचार हो रहा है और हिंदी आसान हो रही है। हिंदी भाषा को खुलना होगा। इसे मार्केट की भाषा बनना होगा। जब तक यह भाषा नहीं खुनेगी तब तक इसे परेशानी होती रहेगी। आज के समय में हिंदी बोलने और सुनने वालों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है। लेकिन जो प्रोफेसर और कवियों वाली हिंदी है उसको बोलने और सुनने वाले कम हुए हैं। हिंदी में जो बदलाव हुए हैं वो मुझे स्वीकार हैं क्योंकि बदलाव प्रकृति का नियम है। जो चीजें पहले थीं वो अब वैसी नहीं रही हैं। जो कपड़े आज से दस साल पहले पहनते थे वो आज नहीं पहनते, 1970 में जो फिल्में बनती थी वो 1990 में नहीं बनी और 1990 में बनने वाली फिल्में आज नहीं बन रही हैं। अंग्रेजी में बदलाव हुआ है। हर चीज में बदलाव हुआ हैं खेल में बदलाव हुआ हैं। हिंदी को भी बदलना होगा। और हिंदी भाषा में रोजना जो नए प्रयोग किए जा रहे हैं उनका हिंदी भाषा पर असर बहुत अच्छा पड़ेगा। इससे हिंदी की पहुंच बहुत सारे लोगों तक हो सकती है। चाहे उसे अपनी दिशा बदलनी पड़े। मेरा मानना है कि ऐसे प्रयोगों से हिंदी मजबूत होगी। इसका महत्व बढ़ेगा। सरकार को चाहिए कि हिंदी भाषा को पाठ्यक्रम की भाषा से हटाकर आम बोलचाल की भाषा बनाने का प्रयास करे। इसे एकेडमिक भाषा से आम बोलचाल की भाषा बनाना होगा। जनता जैसा सुनना चाहती है जैसा बोलना चाहती है उसे करने दें। आज देखा जाए तो सरकार की नीतिओं में भी हिंदी एकेडमिक भाषा बनकर रह गई है।
सुधीर चौधरी, सीईओ और एडिटर-इन-चीफ, लाइव इंडिया और मी-मराठी