Friday, October 22, 2010

अंग्रेजी थोपने की तैयारी

प्रशासनिक सेवा की नई परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं हृदयनारायण दीक्षित
प्रबंधन प्रशासन का विकल्प नहीं होता। कलमाड़ी और शीला जैसे मनमोहन प्रबंधकों ने ही राष्ट्रमंडल खेल आयोजनों में भारत की छवि को तार-तार किया है। प्रशासन की कामयाबी का मूलाधार संवेदनशील जनोन्मुखता है, प्रबंधन की सफलता का आधार बनावटी आचार और जुगाड़-व्यवहार है। बावजूद इसके केंद्रीय कार्मिक विभाग सिविल सेवाओं आईएएस, आईएफएस व आईपीएस आदि की प्रवेश परीक्षा प्रथम (प्रीलिम) के लिए प्रबंधक गुरु बनाने का नया प्रस्ताव लाया है। दावा है कि इससे अभ्यर्थियों की प्रशासनिक अभिरुचि क्षमता का मूल्यांकन होगा। 200 अंकों वाले प्रथम प्रश्नपत्र में ताजा राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय घटनाएं, भारतीय इतिहास, राजनीति और शासन, आर्थिक सामाजिक विकास, सामान्य विज्ञान के साथ जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन आदि विषय हैं। 200 अंकों के ही दूसरे पर्चे में एमबीए की तर्ज पर अंग्रेजी भाषा का ज्ञान, गणित, तर्कशक्ति परीक्षण, आंकड़ों का विवेचन संवाद, संचार क्षमता आदि विषय शामिल हैं। अब तक सामान्य ज्ञान के 150 अंकों व 150 प्रश्नों वाले पहले पर्चे में प्रति प्रश्न एक अंक मिलता था, लेकिन 300 अंकों वाले दूसरे पर्चे में अभ्यर्थी स्वयं चयनित विषय में अपनी सर्वोत्तम क्षमता प्रकट करता था। अब इसकी जगह अंग्रेजीज्ञान व प्रबंधन के विषय हैं। सो ढेर सारी आलोचनाएं शुरू हो चुकी हैं। दुनिया के किसी भी देश की प्रशासक चयन परीक्षा में विदेशी भाषा ज्ञान की अनिवार्यता नहीं है। भारतीय अधिकारी विभिन्न राज्यों में नियुक्त होते हैं। वे संबंधित राज्य की भाषा सीखते हैं। दक्षिण भारत के अधिकारी उत्तर भारतीय नियुक्ति के दौरान खूबसूरत हिंदी बोलते, लिखते हैं। उत्तर भारतीय अधिकारी दक्षिणी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा में संवाद करते हैं। पीडि़त व्यक्ति भी क्षेत्रीय भाषा में ही व्यथा सुनाते हैं। उच्च अधिकारी भी अपने अधीनस्थों को प्राय: भारतीय भाषाओं में ही निर्देश देते हैं। अंग्रेजी की जरूरत मंत्रियों, सांसदों या विधायकों से वार्ता के दौरान भी नहीं पड़ती। मूलभूत प्रश्न यह है कि आखिरकार प्रशासनिक क्षमता और अभिरुचि का अंग्रेजी से क्या संबंध है? अंग्रेजी ज्ञान का प्रशासनिक कामकाज से रिश्ता क्या है? केंद्र ने जनोन्मुखी नहीं, बाजारोन्मुखी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हितैषी नया प्रशासक वर्ग बनाने के लिए ही यह नया प्रस्ताव करवाया है। पूरा प्रस्ताव संविधान की मूल भावना का ही विरोधी है। संविधान में संघ को निर्देश है कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए। लेकिन यहां राष्ट्रभाषा हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के प्रभुत्व की स्थापना है। नए प्रस्ताव का सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा (मेन्स) से कोई लेना-देना नहीं है। मुख्य परीक्षा में 200 अंकों का निबंध है। 1200 अंकों वाले दो विषय हैं, सामान्य ज्ञान के 600 अंक हैं। अंग्रेजी व भारतीय भाषाओं के हरेक पर्चे के लिए 300 अंक हैं, लेकिन भाषा वाले अंकों से मेरिट नहीं बनती। इसी मुख्य परीक्षा के लिए योग्य अभ्यर्थी चयन करना ही प्रीलिम का लक्ष्य है। लेकिन यहां प्रीलिम का कोई मतलब नहीं है। आखिरकार श्रेष्ठ प्रशासक की योग्यता क्या है? संवेदनशीलता और संविधान के प्रति सर्वोपरि निष्ठा उसका सर्वोत्कृष्ट गुण होना चाहिए। संविधान की उद्देश्यिका और राज्य के नीति निर्देशक तत्व प्रशासक के आधारभूत पथ निर्देशक हैं। उद्देश्यिका या नीति निर्देशक तत्वों का संचार ज्ञान, समीक्षा साम‌र्थ्य या आंकड़ा विश्लेषण का कोई संबंध नहीं है, तर्कशक्ति का संबंध दर्शन से है। संवैधानिक निष्ठा व तर्क क्षमता परस्पर विरोधी तत्व हैं। केंद्र भारतीय प्रशासन को अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सेवक बनाने पर आमादा है। कोई 3-4 वर्ष पहले कार्मिक मंत्रालय से संबद्ध संसद की एक स्थायी समिति ने भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था व विश्व व्यापार संगठन की चुनौतियों के बरक्स व्यावसायिक बुद्धि वाले अधिकारियों की जरूरत बताई थी। कांग्रेसी सरकार की काया में मैकाले के प्रेत की छाया है और अमेरिकी व्यापारिक हितों की माया है। उत्कृष्ट प्रशासक भारत की आवश्यकता हैं। आईएएस/आईपीएस/आईएफएस होना ज्यादातर मेधावी छात्रों का सपना होता है। ग्रामीण क्षेत्रों की भी तमाम प्रतिभाएं सिविल परीक्षा में बाजी मारती थीं। प्रत्येक छात्र अंग्रेजी नहीं पढ़ता। नए प्रस्ताव ने ग्रामीण छात्रों व गैर अंग्रेजी युवकों के लिए इस परीक्षा के द्वार बंद कर दिए हैं। प्रस्तावित प्रश्नपत्र के विषय विश्वविद्यालयों में नहीं पढ़ाए जाते। विश्लेषण क्षमता, संचार कौशल, आंकड़ों की बाजीगरी आदि विषय भारतीय विश्वविद्यालयों के कोर्स में नहीं हैं। तर्कशास्त्र दर्शन शास्त्र का हिस्सा है, लेकिन दर्शन के विद्यार्थी अन्य विषय नहीं जानते। सिविल परीक्षाओं के लिए देश में हजारों कोचिंग संस्थाएं हैं। इनकी फीस बहुत महंगी है। निर्धन छात्र कोचिंग का खर्च नहीं उठा सकते। अभ्यर्थियों को कोचिंग से दूर रखने के कोर्स की चर्चा थी, लेकिन नए मसौदे में कोचिंग व्यवस्था ही अनिवार्य हो गई है। नए कोर्स का अध्ययन अन्य किसी भी स्त्रोत से संभव नहीं दिखाई पड़ता। कोचिंग संस्थाएं इस विकल्पहीनता का लाभ उठाएंगी, फीस और भी महंगी होगी। साधारण परिवार के युवकों-बच्चों का ऐसी परीक्षा में शामिल होना असंभव होगा। कल्याणकारी राष्ट्र-राज्य में बाजार विशेषज्ञ प्रबंधक नहीं लोकमंगल साधक-प्रशासक की जरूरत होती है। प्रशासन का मुख्य लक्ष्य लोकहित होता है। अधिकारियों को भारत के दर्शन, सामाजिक गठन, नैतिक और पंथिक मूल्यों की जानकारी होनी ही चाहिए। लेकिन पं. नेहरू की कांग्रेस ने अंगे्रजी सत्ता के ध्वंसाशेषों पर भारतीय प्रशासन का ढांचा खड़ा किया। मोरिस जोन्स ने ठीक लिखा, ब्रिटिश शासक 1947 में चले गए लेकिन प्रशासन का तंत्र, आकार, कार्य का ढंग, पारस्परिक संबंध सबके सब जस के तस रहे। भारतीय प्रशासक भिन्न नस्ल की प्रजाति हैं। एसएन वोहरा समिति ने यहां नौकरशाह, माफिया और राजनेता का त्रिगुट बताया था। टीएन शेषन ने नौकरशाही को रीढ़विहीन प्राणी और कार्लगर्ल कहा था। प्रशासनिक सुधार पर अनेक आयोग बने, अनेक सिफारिशें हुईं, लेकिन प्रशासन को संविधाननिष्ठ और संवेदनशील बनाने की सारी कसरतें बेकार हुईं। संप्रति उन्हें प्रशासक से प्रबंधक बनाने की तैयारी है। नया कोर्स बाजारवाद को शक्तिशाली बनाने का मनमोहन फार्मूला है। सामान्य जन और ग्रामीण अब अधिकारी नहीं बन सकते। भविष्य के प्रशासक परिशुद्ध प्रबंधक होंगे, अंग्रेजी घरों से आएंगे, अंग्रेजी में सोचेंगे, अंग्रेजी में बोलेंगे, अंग्रेजी में काम करेंगे। बेशक वे शतप्रतिशत इंडियन होंगे, लेकिन गरीब, शोषित, पीडि़त, भुखमरी और बेरोजगारी से ग्रस्त विकासशील इस भारत के लिए उनके संवेदनहीन तार्किक चित्त में कोई जगह नहीं होगी। संघ लोकसेवा आयोग पुनर्विचार करे। संसद संवाद करे। कृपया भारत को भारतीय प्रशासक ही दीजिए। (लेखक उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य हैं)

लेख दैनिक जागरण के सम्पदीय से लिया गया है 

Saturday, October 9, 2010

हिंदी को बिगाड़ रहे हैं हिंदी अखबार

मुंबई विवि के हिंदी विभाग की तरफ से आयोजित परिचर्चा : नवभारत टाइम्स के
एनबीटी बनने पर चिंता : मुंबई : युवा पीढी के नाम पर कुछ अखबार हिंदी को
हिंगलिश बनाने पर तुले हुए हैं. मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की
तरफ से आयोजित परिचर्चा में बुद्धिजीवियों की यह चिंता उभर कर सामने आई.
नवभारत टाइम्स (मुंबई) के पूर्व संपादक विश्वनाथ सचदेव ने कहा कि जब घर
का गुसलखाना - बाथरुम, रसोई घर- किचन बन जाए और हिंदी के अखबार संसद को
पार्लियामेंट, प्रधानमंत्री को पीएम लिखने लगे, नवभारत टाइम्स एनबीटी बन
जाए तो हिंदी के लिए खतरे की घंटी जरूर सुनाई देती है. उन्होंने कहा कि
हिंदी को संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा बनाने से पहले जरूरी यह है
कि सही मायने में हिंदी को पहले इस देश की राष्ट्रभाषा बनाया जाए.
मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की तरफ से आयोजित परिचर्चा 'हिन्दी
का वर्तमान स्वरूप : दिशा और दशा' में बोलते हुए सचदेव ने कहा कि इधर
हिंदी की अलग-अलग बोलियों को लेकर लोगों का आग्रह बढ़ा है. पर अच्छा यह
होगा कि हम हिंदी की बात करें, क्योंकि इसका विशाल दायरा है. सचदेव ने
हिंदी अखबारों में अंग्रेजी शब्दों के बढ़ते इस्तेमाल पर ऐतराज जताया.
परिचर्चा के उद्घाटनकर्ता महाराज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्यकारी
अध्यक्ष नंदकिशोर नौटियाल ने कहा कि हिंदी की ताकत को अमेरिका ने भी
पहचान लिया है. इसलिए वहां दर्जनों विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा
रही है. उन्होंने कहा कि एक शोध से पता चला है कि हिंदी दुनिया में सबसे
ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है. जबकि अब तक इसे दूसरे नंबर पर माना जाता
है. वरिष्ठ लेखक डॉ. नंदलाल पाठक ने कहा कि हिंदी को लेकर परेशान होने की
जरूरत नहीं है. हिंदी खुद ब खुद फल-फूल रही है.
परिचर्चा में भाग लेते हुए 'हमारा महानगर' के स्थानीय संपादक राघवेंद्र
द्विवेदी ने कहा कि हिन्दी को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है. हिन्दी
का भविष्य उज्ज्वल है और यह तेजी से आगे बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि अब
दक्षिण के लोगों को भी हिंदी से परहेज नहीं रहा. सब लोग हिंदी को अपना
रहे हैं. हिंदी के लिए अंग्रेजी के विरोध की जरूरत नहीं है. 'नवभारत' के
वरिष्ठ संवाददाता विजय सिंह 'कौशिक' ने कहा कि विभिन्न भाषा व
संस्कृतियों वाले देश में राष्ट्र को एक सम्पर्क भाषा की जरूरत है और
हिंदी में ही वह सम्पर्क भाषा बनने का दमखम है. उन्होंने कहा कि हिन्दी
को लेकर सरकार के पास कोई नीति नहीं है. सरकार को इसे रोजगार की भाषा
बनाने के लिए उचित कदम उठाना चाहिए. हिंदी को शुद्धतावादियों से बचाने की
जरूरत पर बल देते हुए सिंह ने कहा कि इसका मतलब यह भी नहीं है कि हिंदी
में अंग्रेजी के शब्द जबरन ठूंसे जाएं.
हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय ने कहा कि हिंदी भी
रोजगार देने वाली भाषा है और हिंदी दुनियाभर में अपनी पहचान बना रही है.
उन्होंने कहा कि अंग्रेजी, स्पेनिश, चीनी, अरबी, फ्रेंज व रूसी संयुक्त
राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा है. इनमें अरबी व स्पेनिश भाषा बोलने वालों
की संख्या काफी कम है जबकि दुनियाभर में 1 अरब 11 लोगों की भाषा है
हिंदी. इस हिंदी को संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा होने का पूरा
अधिकार है.
मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय, विलेपार्ले के प्राध्यापक रविद्र
कात्यायन ने कहा कि मैं यह बात नहीं मानता कि हिंदी रोजगार नहीं दिला
सकती. यदि आपको सौ प्रतिशत हिंदी और ५० प्रतिशत अंग्रेजी का ज्ञान हो तो
काम की कोई कमी नहीं है. वरिष्ठ साहित्यकार सुधा अरोड़ा ने हिंदी अखबारों
में अग्रेजी के अत्यधिक प्रयोग पर दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि जब
प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों को केवल अंग्रेजी अक्षर का ज्ञान दिया जाएगा
तो वे बाद में हिंदी को कैसे अपना सकेंगे. लातूर के डॉ. मानधने ने कहा कि
बाजार हिंदी से चलती है पर बाजार के लोग अंग्रेजी बोलने में ही अपनी शान
समझते है. इस मौके पर मुंबई विवि के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. विष्णु
सरवदे, मुंबई विवि के उपकुलसचिव आशुतोष राठोड़, नवभारत टाइम्स के वरिष्ठ
कॉपी संपादक दुर्गेश सिंह, हमारा महानगर के कार्यालय संवाददाता रामदिनेश
यादव आदि मौजूद थे.


मुंबई से विजय सिंह 'कौशिक' की रिपोर्ट
भड़ास4मीडिया - आयोजन    

Friday, October 8, 2010

मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास में हिन्दी दिवस

विश्व में 75 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं। इस आंकड़े में वे लोग भी शामिल हैं, हिंदी जिनकी मातृभाषा नहीं है। रूस में भी कई लोग हिंदी  सीखते हैं और हिंदी बोलते भी  हैं। इसलिए, हैरानी की कोई बात नहीं है कि प्रतिवर्ष मास्को में मनाए जाते हिंदी दिवस में बहुत से रूसी लोग भी भाग लेते हैं। इस बार  भारतीय दूतावास में हिंदी के कई अध्यापक, कई अनुवादक,  विशेषज्ञ और छात्र-छात्राएँ इकट्ठा हुए।रेडियो रूस के कई कर्मी भी वहाँ पहुँचे हुए थे जिनमें हमारी संवाददाता तात्याना कोपिलोवा  शामिल थीं। भारतीय राजदूत श्री प्रभात शुक्ला जी ने एकत्र हुए युवाओं और युवतियों तथा रेडियो रूस के कर्मियों और श्रोताओं को अपनी शुभकामनाएँ दीं।
 रूसी लोग हमेशा ही भारत में, उसकी संस्कृति में गहरी दिलचस्पी लेते रहे हैं। रूस के कई उच्च शिक्षा संस्थानों, जैसे मास्को राजकीय विश्वविद्यालय, मास्को अंतराष्ट्रीय संबंध संस्थान, व्यावहारिक प्राच्य विद्या संस्थान और राजकीय आर्ट्स युनिवर्सिटी के अलावा जवाहर लाल नेहरू सांस्कृतिक केंद्र में भी हिंदी पढ़ाई जाती है।
मास्को में कुछ ऐसे विशेष स्कूल भी हैं जहाँ बच्चों को 9-10 साल की उम्र से ही हिंदी पढ़ाई जाती है। किसी विदेशी के लिए हिंदी भाषा को सीखना कोई आसान काम नहीं है। कोई भी विदेशी भाषा सीखने के लिए केवल इच्छा और क्षमता की ही नहीं बल्कि बड़े धैर्य और दृढ़ता की अति आवश्यकता होती है। हाँ, तो इसके लिए अच्छी पाठ्यपुस्तकों और प्रतिभावान शिक्षकों की भी ज़रूरत होती है। मास्को विश्वविद्यालय के अंतर्गत एशिया-अफ्रीका संस्थान की अध्यापिका प्रो. ल्युदमिला ख़ख्लोवा ने अपनी पढाई के वर्षों को याद किया और उस समय की आज के समय से तुलना की।
भारतीय दूतावस में मनाए गए हिंदी दिवस के  दौरान रूसी युवकों और युवतियों को हिंदी बोलते सुनकर हमें बेहद खुशी हुई। क्सेनिया नाम की एक छात्रा ने तो सभी को चकित कर दिया। उसने हिंदी में लिखी अपनी कविता सुनाकर लोगों को मंत्र-मुग्ध कर दिया।हिंदी दिवस समारोह के दौरान कई रूसी कवियों और लेखकों की रचनाओं के हिंदी अनुवाद  भी सुनने को मिले। महान रूसी कवि अलेक्सांदर पुश्किन को भला कौन नहीं जनता है? ! उनकी कविता  - मुझे याद है वो अद्भुत क्षण!  का अति सुन्दर अनुवाद किया है, हिंदी भाषा के विद्वान, प्रो. मदनलाल मधु जी ने। मधु जी भी वहाँ उपस्थित थे! लेकिन इस कविता को एक रूसी युवती आन्ना ज़खारोवा ने अपनी  मनमोहक आवाज़ में सुनाया।

सौजन्य - 
http://hindi.ruvr.ru/2010/10/07/24642388.html
वीडियो : http://hindi.ruvr.ru/data/2010/10/07/1223557510/indidivas.mp3

Wednesday, October 6, 2010

ऑस्ट्रेलिया में हिंदी गौरव के पहले मुद्रित संस्करण का लोकार्पण

2 अक्टूबर को गाँधी जयंती एवं लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिवस के शुभ
अवसर पर सिडनी में हिंदी के क्षेत्र में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़
गया| हिंदी गौरव ऑनलाइन समाचार-पत्र की सफलता के पश्चात सिडनी गुजरात
भवन, सिडनी में करीब 250 लोगों की उपस्थिति में हिंदी गौरव के प्रथम
प्रिंट संस्करण का विमोचन भारत के कौंसुल जनरल सिडनी माननीय अमित दास
गुप्ता के कर कमलों से हुआ| इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों में पेरामेटा से
सांसद माननीया तान्या गेडियल डिप्टी स्पीकर एन एस डब्लू संसद, माननीय
सांसद फिलिप रुड़क(पूर्व मंत्री), माननीय सांसद लौरी फर्गुसन आदि थे|

कार्यक्रम का शुभारम्भ सिडनी की प्रतिष्ठित रंगमच अभिनेत्री ऐश्वर्या
निधि ने सभी उपस्थित गणमान्य अतिथियों का स्वागत करते हुए किया| 2
अक्टूबर को गाँधी जी एवं लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिवस पर दोनों को
याद करते हुए उनके जीवन एवं उनके द्वारा किये गए योगदान पर प्रकाश डाला|
ऐश्वर्या निधि इस कार्यक्रम की संचालिका थी जिन्होंने इस कार्यक्रम को
सफलतापूर्वक संपन्न कराया|

सबसे पहले हिंदी गौरव की सरंक्षक डॉ शैलजा चतुर्वेदी ने बोलते हुए हिंदी
गौरव की ओर से सभी उपस्थितजनों को स्वागत किया एवं इस शुभ अवसर पर सभी के
द्वारा अपना अमूल्य सहयोग देने के लिए सभी का कोटि-कोटि धन्यवाद दिया|
आपने सिडनी में किये जा रहे विभिन्न संस्थाओं एवं व्यक्तियों का उल्लेख
करते हुए सिडनी में हिंदी की यात्रा पर प्रकाश डाला| आपने हिंदी समाज के
द्वारा हिंदी के क्षेत्र में किये गए कार्यों का उल्लेख किया| डॉ शैलजा
चतुर्वेदी जी ने हिंदी गौरव ऑनलाइन समाचार-पत्र की सफलता का उल्लेख करते
हुए इसको प्रिंट मीडिया में लाने के लिए सभी के सहयोग के लिए आभार व्यक्त
किया| आपने हिंदी गौरव को हर आदमी तक पहुँचने के लक्ष्य को बताते हुए
सिडनी में भारतीय समुदाय में हिंदी के महत्व को भी उजागार किया| आपने कुछ
बेहद उम्दा कवितायें लोगों को सुनाई|

विशिष्ट अतिथि तान्या गेडियल ने वक्ता के रूप में महात्मा गाँधी जी के
द्वारा किये गए कार्यों की सराहना की एवं उनके अहिंसा के सिद्धांत के आज
के परिवेश में उल्लेख किया| आपने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर
शास्त्री जी का भी उल्लेख किया| आपने हिंदी गौरव की बढ़ती लोकप्रियता को
सराहा, एवं हिंदी गौरव की टीम को विमोचन के अवसर पर हार्दिक बधाई दी|

सांसद फिलिप रुड़क(पूर्व मंत्री) एवं सांसद लौरी फर्गुसन ने इस कार्यक्रम
में दो अक्तूबर के महत्व पर प्रकाश डालते हुए गाँधी एवं लाल बहादुर
शास्त्री के जीवन का उल्लेख किया| हिंदी गौरव के शुभारम्भ पर बधाई दी|

मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए भारत के कौंसुल जनरल सिडनी माननीय अमित
दास गुप्ता ने अपने संबोधन में कहा कि बापू सारी दुनिया में शांति चाहते
थे। उन्होंने महात्माजी के संदेशों को विस्तार से समझाया और कहा कि उनकी
मृत्यु के इतने लंबे समय बाद भी उनके विचार सारी दुनिया के लिए प्रासंगिक
हैं। आपने लाल बहादुर शास्त्री के जीवन पर भी प्रकाश डाला| आपने हिंदी
गौरव की टीम को हिंदी को ऑस्ट्रेलिया में लोकप्रिय बनाने के लिए प्रेरित
किया एवं समाज में समाचार पत्र के महत्व को बताया की समाचार-पत्र समाज का
आईना होता है| आपने हिंदी गौरव की टीम को सहयोग देने का आश्वासन दिया|

माननीय अमित दास गुप्ता ने अपने संबोधन के बाद हिंदी गौरव के प्रथम
प्रिंट संस्करण का विमोचन किया जिसमें सांसद माननीया तान्या गेडियल
डिप्टी स्पीकर एन एस डब्लू संसद, माननीय सांसद फिलिप रुड़क(पूर्व
मंत्री), माननीय सांसद लौरी फर्गुसन एवं डॉ शैलजा चतुर्वेदी ने सहयोग
किया|

हिंदी गौरव के विमोचन के बाद कई रंगारंग कार्यक्रम अभिनय स्कूल ऑफ़
फरफोर्मिंग आर्ट्स के सौजन्य से प्रस्तुत किये गए| इन रंगारंग
कार्यक्रमों में मनमोहक नृत्य, भांगड़ा एवं देशभक्ति एवं उम्दा गायन
सम्मिलित थे| इस अवसर पर दो बच्चियों तान्या एवं पेरिस द्वारा जय हो पर
किया गया नृत्य ने सभी का मन मोह लिया, इसके बाद निष्ठा कुलश्रेष्ठ ने एक
मिश्रित गाने पर नृत्य किया| जैसा की अधिकतर भांगड़ा के बिना कार्यक्रम
अधूरा होता हैं इसमें भी एक बेहद आर्कषक भांगड़ा जसदेव भाटिया द्वारा
प्रस्तुत किया| लता, राजेंद्र बालस्कर एवं भैरव वर्मा द्वारा मनमोहक गायन
प्रस्तुत किये गए| नेहा दबे ने बहुत खूबसूरत नृत्य पेश किया आप सिडनी की
एक होनहार डांसर है|

सिडनी में हिंदी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले कवि एवं लेखक
अब्बास रज़ा अल्वी ने हिंदी गौरव के ओर से सभी अतिथियों एवं गणमान्य
व्यक्तियों का आभार व्यक्त किया|

कार्यक्रम के समापन पर हिंदी गौरव के मुख्य संपादक अनुज कुलश्रेष्ठ ने
हिंदी गौरव को सफल बनाने के लिए सभी का धन्यबाद दिया ओर इस अवसर पर हिंदी
गौरव से जुड़े हुए सभी सदस्यों का उपस्थितजनों से परिचय कराया| हिंदी
गौरव के तकनीकी प्रमुख हेमेन्द्र नेगी हैं| यह कार्यक्रम सिडनी गुजरात
भवन में प्रथम कार्यक्रम था, इस भवन का शुभारम्भ भी हिंदी गौरव के विमोचन
के साथ हुआ| यह भवन ऑस्ट्रेलिया में भारतीय समुदाय का पहला भवन हैं|



लेख साभार 
विजय कुमार मल्होत्रा
पूर्व निदेशक (राजभाषा),
रेल मंत्रालय,भारत सरकार



लेख का लिंक http://hindi-khabar.hindyugm.com/2010/10/hindi-gaurav-is-in-print-now.html

Friday, October 1, 2010

बदलते परिवेश में अनुवादकों की भूमिका

जहां एक ओर पिछले कुछ दशकों में सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव आया है वहीं दूसरी ओर हिंदी के ज़रिए एक वैश्‍विक

क्रांति का आगाज़ हुआ है। न सिर्फ हिंदीतर भाषी बल्कि विदेशी भी यह समझ चुके है कि अगर आम भारतीयों को कोई संदेश देना है तो हिंदी को माध्यम

बनाना ही होगा।  आज अनुवाद एक व्यापक विषय बन गया। पूरे विश्‍व में तेज़ी से बदलाव आ रहा है। अत: बदलते परिवेश में अनुवाद के संदर्भ में अनेक

बिंदुओं का विकास अब ज़रूरी हो गया है। इसमें अनुवादकों की भूमिका काफी बढ़ जाती है।


आज बाज़ारवाद के असर में हिंदी भाषा के बदलते रूप से कौन नहीं परिचित है। यह एक व्यावसायिक हिंदी का रूप इख़्तियार कर चुकी है। इसका चौतरफा

विस्तार हो रहा है। इसके फलस्वरूप हिंदी ने इस घोर व्‍यावसायिक युग में संचार की तमाम प्रतिस्‍पर्धाओं को लाँघ अपनी गरिमामयी उपस्थिति भी दर्ज

कराई । जिसका रोजमर्रा की जिंदगी में कोई खास उपयोग नहीं है वह प्रायः आम लोगों के लिए कोई विशेष महत्‍व नहीं रखती। मशीनी युग के भाग-दौड़ में वही चीज स्‍वागतेय है जिसका सीधा और तीव्र प्रभाव पड़ता हो। परिवर्तन ही एक मात्र शाश्‍वत है। हिंदी को भी रूढिवादिता एवं परंपरावादिता से बाहर निकल कर दैनिक जीवन की छोटी-बड़ी सभी आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए बाजार के मान-दंड पर खड़ा होना पड़ा है। इस हिंदी का सौन्दर्य अलंकारों से नहीं साधारणीकरण से है। आज अनेक विदेशी उत्‍पादों के विज्ञापन भारत में हिंदी में किए जाते हैं ऐसी हिंदी में जो आम आदमी से लेकर खास आदमी तक पर प्रभाव डाल सके। फलत: हिंदी के ज़रिए रोजगार के नए-नए अवसरों का समावेश हुआ है।


हालांकि साहित्‍य के अलावे ज्ञान-विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में भी हिंदी का इतिहास कमजोर नहीं रहा है, अपितु ज्ञान-विज्ञान का हस्‍तांतरण मजबूत

भाषा की विशेषता रही है। आज की तारीख में चिकित्‍सा, अभियंत्रण,पारिस्थितिकी, अर्थशास्‍त्र से लेकर विभिन्‍न भाषाओं से साहित्‍य का

हिंदी में अनुवाद करने वालों की भारी मांग है। यह पूर्णतः अनुवादक पर निर्भर करता है कि वह जिस भाषा से और जिस भाषा में अनुवाद कर रहा है उन

भाषाओं पर उसका कितना अधिकार है और इन भाषाओं की अनुभूतियों में वह कितनी तारतम्‍यता कायम रख सकता है। एक सफल अनुवादक वही होता है जो अनूदित कृति में भी मूल कृति की नैसर्गिक अनुभूतियों को अपरिवर्तित रखे। अनुवाद करते समय स्रोत भाषा की रचना के परिवेश और प्रसंग को समझकर ही अनुवादक को लक्ष्य भाषा में अनुवाद करना चाहिए। अपने किसी आत्मीय को बहुत दिनों के बाद देखकर अगर कोई पश्‍चिम के देशों का विदेशी कहे “You came as sunlight” तो इसका अनुवाद हिंदी में “तुम सूर्यप्रकाश की तरह आए” के स्थान पर “तुम्हारे आने से बड़ी खुशी हुई” सही होगा।


कार्यालयों में अनुवाद का प्रयोग एक विशेष प्रयोजन के लिए होता है। राजभाषा हिंदी के ज़रिए हमारा प्रयास भारत के सभी प्रांतों, अंचलों और

जनपदों के बीच सौहार्द्र, सौमनस्य व परस्पर स्नेह से एक सूत्र में बांधने का होना चाहिए। राजभाषा के प्रयोग का अधिकाधिक अवसर तभी मिलेगा जब उसमें सभी भारतीय भाषाओं के शब्दों का सहज समावेश हो। अनुवाद और अनुवादक की सार्थकता तभी है जब प्रवाहमय भाषा का प्रयोग होगा। भाषा में सदैव नए प्रयोग चलते रहते हैं। हिंदी भाषा में भी बाज़ारवाद, वैश्‍वीकरण,भौगोलीकरण एवं भूमंडलीकरण के कारण कई नए प्रयोग हो रहे हैं। अनुवादकों को

इस बात का ख़ास ख़्याल रखना चाहिए। उन्हें इन परिवर्तनों को अपनी सहज प्रवृत्ति के रूप में ढ़ालना चाहिए। सहज प्रवृत्ति से सहज भाषा निर्मित

होती है। सहज भाषा ही सर्वग्राह्य होगी। अनुवादकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि हिंदी भाषा को इतना बोझिल और कृत्रिम न बना दिया जाए कि इसकी

सहजता नष्ट होने लगे। प्रचलित और सबकी समझ में आने वाली व्यवहार-कुशल हिंदी ही सर्वग्राह्य हो सकती है। सरकारी कार्यालयों में साहित्यिक और

व्याकरण सम्मत हिंदी का आग्रह रख हम इसका विकास नहीं कर सकेंगे। यहां की शब्दावली में न तो भावनाओं का प्रवाह होता है न विचारों की प्रबलता। यहां मात्र माध्यम बनने की नियति होती है। अनासक्त तटस्थता यहां के अनुवाद का मूलमंत्र है।


अनुवाद करते समय स्रोत भाषा की रचना के परिवेश और प्रसंग को समझकर ही अनुवादक को लक्ष्य भाषा में अनुवाद करना चाहिए।! अत: परिवर्तन के इस दौर में अनुवादकों की भूमिका काफी चुनौतीपूर्ण है। अनुवाद में स्रोत भाषा के अर्थ या संदेश का लक्ष्य भाषा में सम्प्रेषण ही मुख्य बात है। समरूपता की दृष्टि से दो भाषाओं में संरचनात्मक अंतर स्वाभाविक है। अनुवाद में स्रोत भाषा में कही गई बात को लक्ष्य भाषा में व्यक्त करने के लिए लक्ष्य भाषा

के समतुल्य शब्द, भाव और कथ्य ही अनुवादक का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। एक भाषा के पाठ की भाषिक व्यवस्था का दूसरी भाषा की भाषिक प्रतीक व्यवस्था में रूपांतरण अनुवाद कहलाता है। स्रोत भाषा से लक्ष्य भाषा में अंतरण समतुल्यता के आधार पर किया जाता है। समतुल्यता के सिद्धांत के सार्थक

निर्वाह के बिना सफल अनुवाद संभव नहीं होता। प्रत्येक भाषा का प्रत्येक शब्द अपने-आप में एक प्रतीक होता है और वह एक विशिष्ट प्रकार का आशय अथवा अर्थ ध्वनित करता है। सिद्धांतत: दो प्रतीक एक जैसे अर्थ के वाहक नहीं होते। अंग्रेजी में ‘वाटर’ और ‘एलीफैंट’ के लिए क्रमश: ‘पानी’ और ‘हाथी’सामान्य पर्याय हैं। किंतु क्रमश: नीर, अंबु या तुरंग, गज आदि शब्दों को अंग्रेजी शब्दों के सामान्य पर्याय के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता क्योंकि इन शब्दों की अपनी-अपनी अर्थ ध्वनियां हैं। अनुवादक को लक्ष्य और स्रोत दोनों ही भाषाओं में शास्त्रीय दृष्टि से पारंगत एवं सृजनात्मक

दृष्टि से सक्षम होना चाहिए। तभी उसे दोनों भाषाओं के शब्दों और मुहावरों का ज्ञान हो सकता है। एक ही भाव लिए बहुत समानार्थी शब्द मिल सकते हैं पर वे भिन्न- भिन्न स्थितियों को सूचित करते हैं। अत: उनका प्रयोग बहुत सोच-समझ कर करना होता है। मुहावरों का अनुवाद नहीं हो सकता। अनुवादकों को लक्ष्य भाषा में वैसे ही अर्थ देने वाले मुहावरे ढ़ूंढ़ने होंगे। ‘किसी की आंख का नूर हूँ’ का अनुवाद “the light of one’s eye” न होकर “the apple of one’s eye” होगा। भाषा न कठिन होती है न सरल, सहज या असहज। कैसा भी कठिन शब्द निरंतर

प्रयोग के बाद सहज हो जाता है और अपना बन जाता है। अनुवादक को भाषा की सरलता और जटिलता से ऊपर उठकर सहज भाषा में अनुवाद करना चाहिए। जब अनुवादक सहज भाषा में काम करने लग जाता है तो वह सर्जक हो जाता है। आज अनुवाद का क्षेत्र काफी बढ़ गया है। आज अनुवाद न तो घटिया किस्म का रोजगार रहा और न कामचलाऊ चीज़। आज वह विभिन्न भाषाओं के विस्तार का संसाधन बन गया है। आज

विश्‍व का एक दूसरे से परिचय अनुवाद के परिचयपत्र के माध्यम से हो रहा है। अनुवाद आज सांस्कृतिक साहित्यिक राजदूत की भूमिका निभाता है।

हिंदी आज विविध रूपों में प्रयोग की जाती है। इस विविधता में सौंदर्य भी है, शक्ति भी है। अब यही विविधता अनुवादों की दुरूहता के कारण आम आदमी की उपेक्षा करने लगे तो वह कुरूपता और दुर्बलता का प्रतीक बन जाएगी। अत: अनुवादकों को संस्कृत के भारी-भरकम शब्दों के उपयोग से बचना चाहिए। लंबे वाक्यों को दो या दो से अधिक छोटे वाक्यों में बदलकर लिखना चाहिए। संसार में लगभग तीन हज़ार भाषाएं लिखी जाती हैं। इन भाषाओं में उपलब्ध सभी प्रकार के ज्ञान को एक-दूसरे तक पहुँचाने का माध्यम अनुवाद है। अनुवाद एक भाषा को दूसरी भाषा में लिख देना मात्र नहीं है। यह वह विधा है जिसमें अनूदित रचना स्वतंत्र एवं मौलिक लगे। वह सार्थक और मूल रचना के समग्र अर्थ में होना चाहिए। अत: अर्थ की परिशुद्धता अनुवाद का मूल मंत्र है।


आज साहित्य, तकनीकी तथा संचार के क्षेत्र में अनुवाद का कार्य हो रहा है और इन क्षेत्रों में अनुवाद का चरित्र और सम्प्रेषणीयता का मापदंड भिन्न

है और अनुवादकों का भी. जहाँ साहित्यिक अनुवाद में भाव को सम्प्रेषण करना होता है उसकी पृष्ठभूमि, भावभूमि और बिम्ब संरचना के साथ, वही तकनीकी अनुवाद में तथ्य को अनुवाद करना मुख्य लक्ष्य होता है. आज संचार के क्षेत्र में हिंदी एवं स्थानीय भाषाओँ में काफी अनुवाद हो रहा है खास तौर

पर विज्ञापन ने अनुवाद को नई दिशा दी है.  इसमें अनुवाद का लक्ष्य भाषिक ग्राहकों को लुभाना होता है, उनके हृदय तक पहुँचना होता है, बाज़ार का

सृजन करना होता है. ऐसे में जहाँ साहित्य के अनुवाद के लिए अनुवादक को साहित्यानुरागी होना चाहिए, वही तकनीकी अनुवाद के लिए तकनीकी ज्ञान का होना ए़क  आवश्यकता है.  वही विज्ञापन के अनुवाद में भाषा की समझ के साथ साथ बाज़ार की समझ भी जरूरी है.

उत्कृष्ट अनुवादक वही है जो स्रोत और लक्ष्य भाषा के सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों का भी ध्यान रखे। समाज जिस अर्थ में किसी शब्द का

प्रयोग करता है अनुवादक को भी उसी अर्थ में उस शब्द का प्रयोग करना चाहिए। स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा दो समानान्तर रेखाएं हैं। उनकी परस्पर

दूरी को कम करने का प्रयास अनुवाद है। अनुवादकों को अपनी भाषा में देशी, प्रांतीय और सहज शब्दों को लेना चाहिए तभी हिंदी और हिंदीतर भाषाइयों के

बीच की दूरी कम होगी। आज अनुवाद न तो घटिया किस्म का रोजगार रहा और न कामचलाऊ चीज़। आज वह

विभिन्न भाषाओं के विस्तार का संसाधन बन गया है। आज विश्‍व का एक दूसरे से परिचय अनुवाद के परिचयपत्र के माध्यम से हो रहा है। अनुवाद आज

सांस्कृतिक साहित्यिक राजदूत की भूमिका निभाता है।

लेखक - मनोज कुमार
लेख भेजने वाले -
विजय कुमार मल्होत्रा
पूर्व निदेशक (राजभाषा),
रेल मंत्रालय,भारत सरकार

Wednesday, September 29, 2010

हिंदी रुकने वाली नहीं है : अरविंद कुमार

हिंदी की अपरिहार्य और अनवरोध्य प्रगति के प्रति माधुरी तथा सर्वोत्तम
रीडर्स डाइजेस्ट जैसी पत्रिकाओं के पूर्व संपादक तथा हिंदी के पहले
शब्‍दकोश समांतर कोश के रचयिता और शब्देश्वरी तथा पेंगुइन
हिंदी-इंग्लिश/इंग्लिश-हिंदी थिसॉरस द्वारा भारत में कोशकारिता को नई
दिशा देने वाले अरविंद कुमार। वह हिंदी को आधुनिक तकनीक से लैस करने के
हिमायती हैँ और आजकल इंटरनेट पर पहले सुविशाल हिंदी-इंग्लिश-हिदी ई-कोश
को अंतिम रूप देने में लगे हैं-

हिंदी के उग्रवादी समर्थक बेचैन हैं कि आज भी इंग्लिश का प्रयोग सरकार
में और व्यवसाय मेँ लगभग सर्वव्यापी है। वे चाहते हैं कि इंग्लिश का
प्रयोग बंद करके हिंदी को सरकारी कामकाज की एकमात्र भाषा तत्काल बना दिया
जाए। उनकी उतावली समझ में आती है, लेकिन यहाँ यह याद दिलाने की ज़रूरत है
कि एक समय ऐसा भी था जब दक्षिण भारत के कुछ राज्य, विशेषकर तमिलनाडु,
हिंदी की ऐसी उग्र माँगोँ के जवाब में भारत से अलग होकर अपना स्वतंत्र
देश बनाने को तैयार थे। तब ‘हिंदी वीरों’ का कहना था कि चाहे तो तमिलनाडु
अलग हो जाए, हमें हिंदी चाहिए… हर हाल, अभी, तत्काल… उस समय शीघ्र होने
वाले संसद के चुनावोँ में उन्होँने नारा लगाया कि वोट केवल उस प्रत्याशी
को देँ जो हिंदी को तत्काल लागू करने के पक्ष मेँ हो। सौभाग्य है कि भारत
के लोग इतने नासमझ न थे और न आज हैं कि एकता भंग होने की शर्त पर हिंदी
को लागू करना चाहेँ।
मैँ समझता हूँ कि पूरी राजनीतिक और भाषाई तैयारी के बिना हिंदी को सरकारी
कामकाज की प्रथम भाषा बनाना लाभप्रद नहीं होगा। हिंदी पूरी तरह आने मेँ
देर लग सकती है, पर प्रजातंत्र और राष्ट्रीय एकता के लिए यह देरी
बर्दाश्त करने लायक़ है। तब तक हमें चाहिए कि सरकारी कामकाज में हिंदी
प्रचलन बढ़ाते रहें और साथ-साथ अपने आपको और हिंदी को आधुनिक तकनीक से
लैस करते रहेँ।
इंग्लिश के विरोध की नीति हमेँ अपने ही लोगोँ से भी दूर कर सकती है। आम
आदमी इंग्लिश सीखने पर आमादा है तो एक कारण यह है कि आज आर्थिक और
सामाजिक प्रगति के लिए इंग्लिश का ज्ञान आवश्यक है। दूसरा यह कि संसार का
सारा ज्ञान समेटने के लिए देश को इंग्लिश में समर्थ बने रहना होगा, वरना
हम कूपमंडूक रह जाएँगे। यही कारण था कि 19वीं सदी मेँ जब मैकाले की नीति
के आघार पर इंग्लिश शिक्षा का अभियान चला था, तब राजा राम मोहन राय जैसे
देशभक्त और समाज सुधारक ने उस का डट कर समर्थन किया था। वह देश को
दक़ियानूसी मानसिकता से उबारना चाहते थे। राममोहन राय ने कहा था, ‘एक दिन
इंग्लिश पूरी तरह भारतीय बन जाएगी और हमारे बौद्धिक सामाजिक विकास का
साधन।’ स्वामी विवेकानंद ने भी अमरीका में भारतीय संस्कृति का बिगुल
इंग्लिश के माध्यम से ही फूँका था।
इसके माने यह नहीँ हैँ कि आज हम लोग हिंदी का महत्त्व नहीँ जानते या
हिंदी की प्रगति और विकास रुक गया है या रुक जाएगा। मैं समझता हूँ कि
हिंदी के विकास का राकेट नई तेज़ी से उठता रहेगा। हिंदी अब रुकने वाली
नहीं है, हिंदी रुकेगी नहीं। कारण है हिंदी बोलने समझने वालोँ की भारी
तादाद और उनके भीतर की उत्कट आग।

भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों का तथ्याधारित अनुमान हिंदी
प्रेमियों के लिए उत्साहप्रद है कि आने वाले समय में अंतर्राष्ट्रीय
महत्त्व की जो चंद भाषाएँ होंगी उनमें हिंदी अग्रणी होगी।
संसार में 60 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी,
मारीशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की कुछ जनता हिंदी बोलती है।
अमरीकी, यूरोपीय महाद्वीप और ऑस्ट्रेलिया आदि देशोँ में गए हमारे तथाकथित
एनआरआई कमाएँ चाहे इंग्लिश के बल पर, लेकिन उनका भारतीय संस्कृति और
हिंदी के प्रति प्रेम बढ़ा ही है। कई बार तो लगता है कि वे हिंदी के सबसे
कट्टर समर्थक हैँ।
अकेले भारत को ही लें तो हिंदी की हालत निराशजनक नहीं, बल्कि अच्छी है।
आम आदमी के समर्थन के बल पर ही पूरे भारत में 10 शीर्ष दैनिकों में हिंदी
के पाँच हैँ (दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान, अमर उजाला,
राजस्थान पत्रिका),  तो इंग्लिश का कुल एक (टाइम्स ऑफ़ इंडिया) और मलयालम
के दो (मलयालम मनोरमा और मातृभूमि), मराठी का एक (लोकमत), तमिल का एक
(दैनिक थंती)। इसी प्रकार सबसे ज़्यादा बिकने वाली पत्रिकाओँ में हिंदी
की पाँच, तमिल की तीन, मलयालम की एक है, जबकि इंग्लिश की कुल एक पत्रिका
है। हिंदी के टीवी मनोरंजन चैनल न केवल भारत मेँ बल्कि बांग्लादेश,
पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में भी लोकप्रिय हैं और हिंदी के साथ-साथ
हमारे सामाजिक चिंतन का प्रसार कर रहे हैँ।
जहाँ तक हिंदी समाचार चैनलोँ का सवाल है इंग्लिश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित
न्यूज़ वीकली इकॉनॉमिस्ट ने 14 अगस्त 2010 अंक मेँ पृष्ठ 12 पर
‘इंटरनेशनल ब्रॉडकास्टिंग’ पर लिखते हुए कहा है कि अमरीका और ब्रिटेन के
विदेशी भाषाओँ में समाचार प्रसारित करने वाले संस्थानोँ को अपना धन सोच
समझ कर बर्बाद करना चाहिए। उदाहरण के लिए भारत की अपनी भाषाओँ के न्यूज़
चैनलोँ से प्रतियोगिता करना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है।
हमारी ताक़त है हमारी तादाद…
यह परिणाम है हमारी जनशक्ति का। यही हिंदी का बल है। बहुत साल नहीं हुए
जब हम अपनी विशाल आबादी को अभिशाप मानते थे। आज यह हमारी कर्मशक्ति मानी
जाती है। भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने सही कहा है: ‘अधिक आबादी
अपने आपमें कोई समस्या नहीं है, समस्या है उसकी ज़रूरियात को पूरा न कर
पाना। अधिक आबादी का मतलब है अधिक सामान की, उत्पाद की माँग। अगर लोगों
के पास क्रय क्षमता है तो हर चीज़ की माँग बढ़ती है।’ आज हमारे समृद्ध
मध्य वर्ग की संख्या अमरीका की कुल आबादी जितनी है। पिछले दिनोँ के
विश्वव्यापी आर्थिक संकट को भारत हँसते खेलते झेल गया तो उसका एक से बड़ा
कारण यही था कि हमारे उद्योगोँ के उत्पाद मात्र निर्यात पर आधारित नहीँ
हैँ। हमारी अपनी खपत उन्हें ताक़त देती है और बढ़ाती है।
इसे हिंदीभाषियोँ की और विकसित देशोँ की जनसंख्या के अनुपातोँ के साथ साथ
सामाजिक रुझानोँ को देखते हुए समझना होगा। दुनिया की कुल आबादी आज लगभग
चार अरब है। इसमेँ से हिंदुस्तान और चीन के पास 60 प्रतिशत लोग हैँ। कुल
यूरोप की आबादी है 73-74 करोड़, उत्तर अमरीका की आबादी है 50 करोड़ के
आसपास। सन् 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब से ऊपर हो जाने की संभावना है।
इसमेँ से यूरोप और अमरीका जैसे विकसित देशों की आबादी बूढ़ी होती जा रही
है। (आबादी बूढ़े होने का मतलब है किसी देश की कुल जनसंख्या मेँ बूढे
लोगोँ का अनुपात अधिक हो जाना।) चुनावी नारे के तौर पर अमरीकी राष्ट्रपति
ओबामा कुछ भी कहें, बुढाती आबादी के कारण उन्हेँ अपने यहाँ या अपने लिए
काम करने वालोँ को विवश होकर, मजबूरन या तो बाहर वालोँ को आयात करना होगा
या अपना काम विदेशों में करवाना होगा।
इस संदर्भ मेँ संसार की सबसे बड़ी सॉफ़्टवेयर कंपनी इनफ़ोसिस के एक
संस्थापक नीलकनी की राय विचारणीय है। तथ्यों के आधार पर उनका कहना है कि
‘किसी देश में युवाओँ की संख्या जितनी ज़्यादा होती है, उस देश में उतने
ही अधिक काम करने वाले होते हैँ और उतने ही अधिक नए विचार पनपते हैं।
तथ्य यह है कि किसी ज़माने का बूढ़ा भारत आज संसार में सबसे अधिक युवा
जनसंख्या वाला देश बन गया है। इसका फ़ायदा हमें 2050 तक मिलता रहेगा।
स्वयं भारत के भीतर जनसंख्या आकलन के आधार पर 2025 मेँ हिंदी पट्टी की
उम्र औसतन 26 वर्ष होगी और दक्षिण की 34 साल।’
अब आप भाषा के संदर्भ में इसका मतलब लगाइए। इन जवानों में से अधिकांश
हिंदी पट्टी के छोटे शहरोँ और गाँवोँ में होंगे। उनकी मानसिकता मुंबई,
दिल्ली, गुड़गाँव के लोगोँ से कुछ भिन्न होगी। उनके पास अपनी स्थानीय
जीवन शैली और बोली होगी।
नई पहलों के चलते हमारे तीव्र विकास के जो रास्ते खुल रहे हैँ (जैसे सबके
लिए शिक्षा का अभियान), उनका परिणाम होगा असली भारत को, हमारे गाँवोँ को,
सशक्त करके देश को आगे बढ़ाना। आगे बढ़ने के लिए हिंदी वालोँ के लिए सबसे
बड़ी ज़रूरत है अपने को नई तकनीकी दुनिया के साँचे मेँ ढालना, सूचना
प्रौद्योगिकी में समर्थ बनना।
यही है हमारी नई दिशा। कंप्यूटर और इंटरनेट ने पिछ्ले वर्षों मेँ विश्व
मेँ सूचना क्रांति ला दी है। आज कोई भी भाषा कंप्यूटर तथा अन्य
इलैक्ट्रोनिक उपकरणों से दूर रह कर पनप नहीं सकती। नई तकनीक में महारत
किसी भी काल में देशोँ को सर्वोच्च शक्ति प्रदान करती है। इसमेँ हम पीछे
हैँ भी नहीँ… भारत और हिंदी वाले इस क्षेत्र मेँ अपना सिक्का जमा चुके
हैँ।
इस समय हिंदी में वैबसाइटेँ, चिट्ठे, ईमेल, चैट, खोज, ऐसऐमऐस तथा अन्य
हिंदी सामग्री उपलब्ध हैं। नित नए कंप्यूटिंग उपकरण आते जा रहे हैं। इनके
बारे में जानकारी दे कर लोगों मेँ  जागरूकता पैदा करने की ज़रूरत है ताकि
अधिकाधिक लोग कंप्यूटर पर हिंदी का प्रयोग करते हुए अपना, देश का, हिंदी
का और समाज का विकास करें।
हमेँ यह सोच कर नहीँ चलना चाहिए कि गाँव का आदमी नई तकनीक अपनाना नहीं
चाहता। ताज़ा आँकड़ोँ से यह बात सिद्ध हो जाती है। गाँवोँ मेँ रोज़गार के
नए से नए अवसर खुल रहे हैँ। शहर अपना माल गाँवोँ में बेचने को उतावला है।
गाँव अब ई-विलेज हो चला है। तेरह प्रतिशत लोग इंटरनेट का उपयोग खेती की
नई जानकारी जानने के लिए करते हैँ। यह तथ्य है कि ‘गाँवोँ में इंटरनेट का
इस्तेमाल करने वालोँ का आंकड़ा 54 लाख पर पहुँच जाएगा।
इसी प्रकार मोबाइल फ़ोन दूरदराज़ इलाक़ोँ के लिए वरदान हो कर आया है।
उसने कामगारोँ, कारीगरोँ को दलालोँ से मुक्त कर दिया है। यह उनका चलता
फिरता दफ़्तर बन गया है और शिक्षा का माध्यम। अकेले जुलाई 2010 में 1
करोड़ सत्तर लाख नए मोबाइल ग्राहक बने और देश में मोबाइलोँ की कुल संख्या
चौबीस करोड़ हो गई। अब ऐसे फ़ोनोँ का इस्तेमाल कृषि कॉल सैंटरों से
नि:शुल्‍क  जानकारी पाने के लिए, उपज के नवीनतम भाव जानने के लिए किया
जाता है। यह जानकारी पाने वाले लोगोँ में हिंदी भाषी प्रमुख हैँ। उनकी
सहायता के लिए अब मोबाइलों पर इंग्लिश के कुंजी पटल की ही तरह हिंदी का
कुंजी पटल भी उपलब्ध हो गया है।
हिंदी वालोँ और गाँवोँ की बढ़ती क्रय शक्ति का ही फल है जो टीवी संचालक
कंपनियाँ इंग्लिश कार्यक्रमोँ पर अपनी नैया खेना चाहती थीँ, वे पूरी तरह
भारतीय भाषाओँ को समर्पित हैँ। आप देखेंगे कि टीवी पर हिंदी के मनोरंजन
कार्यक्रमोँ के पात्र अब ग्रामीण या क़स्बाती होते जा रहे हैँ।
सरकारी कामकाज की बात करेँ तो पुणे में प्रख्यात सरकारी संस्थान सी-डैक
कंप्यूटर पर हिंदी के उपयोग के लिए तरह तरह के उपकरण और प्रोग्राम विकसित
करने मेँ रत है। अनेक सरकारी विभागोँ की निजी तकनीकी शब्दावली को समोकर
उन मंत्रालयोँ के अधिकारियोँ की सहायता के लिए मशीनी अनुवाद के उपकरण
तैयार हो चुके हैँ। अभी हाल सी-डैक ने ‘श्रुतलेखन’ नाम की नई विधि विकसित
की है जिसके सहारे बोली गई हिंदी को लिपि में परिवर्तित करना संभव हो गया
है। जो सरकारी अधिकारी देवनागरी लिखने या टाइप करने में अक्षम हैं, अब वे
इसकी सहायता से अपनी टिप्पणियाँ या आदेश हिंदी में लिख सकेंगे। यही नहीं
इसकी सहायता से हिंदी में लिखित कंप्यूटर सामग्री तथा एसएमएस आदि को सुना
भी जा सकेगा।
निस्संदेह एक संपूर्ण क्रांति हो रही है।





लेखक मंच से साभार